कुछ सुखे फूल अक्सर, महक उठते हैं किताबों में
सोंचता था भूल चुका मैं, हर बात इतने सालों में

यादों के जज़ीरे पर कोई, सिसक रहा है आज भी
दिल की दिवारों पर सीलन, मैंने देखी है बरसातों में
(जज़ीरा : टापू (Island), सीलन : dampness,moist)

कुछ रिश्ते सँभालने में, जाती है गुजर उम्र
हो जाता है कोई अपना, दो एक मुलाकातों में

ये बाज़ी तो हारी बाज़ी थी, कैसे ना जाने जीत गया
शायद किसी ने रखा मुझे, हर पल अपनी दुआओं में

मैं हीं नहीं हुँ तन्हा, हमसफ़र उदासियों का
देखा है रोते चाँद को , अक्सर ठंडी रातों में

लगाई है ख़िज़ाँ से अब तो , मैंने सारी उम्मीदें
उजड़ा है नशेमन मेरा , अभी पिछले बहारों में
(ख़िज़ाँ : पतझड़ (Fall season))

बिख़ेरा है ज़र्रा ज़र्रा,इसी आस पे मैंने ख़ुद को ,
लौटोगे तुम कभी यहाँ और, समेट लोगे बाँहों में

कमाल तेरी दिलफ़रेबियाँ, मगर ऐसे हुनर भी देखे हैं
लोग सब कुछ लूट लेते हैं, बस बातों हीं बातों में

हैं हुश्न की देवियाँ बहुत, कोई लैला नज़र नहीं आती
हमने मजनूँ तो फिर भी देखे हैं, इश्क़ के ख़ुदाओं में

कुबूल है हर इल्ज़ाम तेरा, मगर तू छोड़ के क्यूँ चला गया
बस यही जवाब ढ़ुँढ़ता हुँ, मैं तेरे सब सवालों में

raise
sharma.nishu@gmail.com

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