जो लोग तुम्हें जन्नत के झूठे ख़्वाब दिखाते हैं
बचपन जवानी में  तुम्हें गुमराह बनाते हैं
रख ख़ुदगर्ज़ी की ताक पर इस्लाम के हर सीख को
नाम जिहाद का ले कर नस्लों को मिटाते हैं

 

सब यार दोस्त तेरे नाम से आज ख़ुद को बचाए है
और माँ तेरी गुमसम खड़ी आँसू बहाए है
कभी जिस बाप के कंधे पे बैठ जाता था तु मेला
वही बाप धरा ज़ानू पे आज नज़रें झुकाए है

 

ज़रा सोंच तूने जान दे कर क्या कमाया है
कौन सा मज़हब है जिसने ये सिखाया है
जान ले कर बेगुनाहों की मुझे तू ये बता
है एक भी मिसाल जो जन्नत को पाया है ?

 

उन सिपाहियों की जान ली, जो तुझको बचाते थे
ख़ुद जाग कर सीमा पे वो, तुझको सुलाते थे
उनके जिस लहू को तूने आज, मिट्टी में बहाया है
वो इसी लहू से सबके घर दीपक जलाते थे

 

आज जहन्नुम में बैठा तू भी सोंचता होगा
हश्र अपने गुनाहों का तू भी देखता होगा
याद करके झूठी सीखें अपने आक़ाओं की
अश्क़ अपनी आँखों से ख़ुद पोंछता होगा

 

माँ बाप के क़दमों में तेरी दुनिया की जन्नत थी
उसी को छोड़ के तू आज देख दोज़ख़ में बैठा है
ये कैसी शहादत है ?
ये कैसी शहादत है ?

 

तुझे मैं  आज दिखाता हूँ शहादत कैसी होती है
तुझे जिसकी तमन्ना थी वो जन्नत कैसी होती है

 

वो तिरंगे में जो लिपटा है, वतन का एक सिपाही है
उसके लबों पे वो तबस्सुम, शहादत की गवाही है

 

वो जिन चार कंधों पे है बैठा, यार हैं उसके
वो जो भीड़ चारों ओर है, परिवार हैं उसके
सब नेता अफ़सर पास खड़े,गीली आँखें हैं उनकी
वो चुपचाप खड़ी जो कोने में, वो बीवी है उसकी
वो जो नन्हा है आँचल पकड़ा, उनका बेटा है
वो मासूम है ये सोंच रहा, ये कौन लेटा है
जो बिलख़ बिलख़ के रो रही, ये उसका लाल है
बुढ़ा बाप है जो छुपा रहा अपने दिल का हाल है
वो तोपें खड़ी हैं कोने में, उसको सलामी देने को
जन्नत से ख़ुद रब हैं आयें, उसको साथ लेने को
शहादत ऐसी होती है
शहादत ऐसी होती है
raise
sharma.nishu@gmail.com

3 thoughts on “ये कैसी शहादत है

  1. शुक्रिया निर्भय जी । मुझे ख़ुशी है की आप को कविता पसंद आयी।

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